जानीय कलाकारों के पसंदीदा शौक

एण्डटीवी के कलाकारों ने हाॅबी मंथ में बताए अपने पसंदीदा शौक

जनवरी को हॉबी मंथ के रूप में मनाया जाता है। यह महीना हमें याद दिलाता है कि भागदौड़ भरी ज़िंदगी के बीच थोड़ा रुककर उन कामों के लिए समय निकालें, जो हमें खुशी, सुकून और रचनात्मक ऊर्जा देते हैं। इस अवसर पर एण्डटीवी के लोकप्रिय कलाकारों ने अपने पसंदीदा शौक के बारे में खुलकर बात की। इन कलाकारों में शामिल हैं- प्रियंवदा कांत (‘घरवाली पेड़वाली‘ की लतिका), गीतांजलि मिश्रा (‘हप्पू की उलटन पलटन‘ की राजेश) और शिल्पा शिंदे (‘भाबीजी घर पर हैं 2.0‘ की अंगूरी भाबी)। प्रियंवदा कांत, जो ‘घरवाली पेड़वाली‘ में लतिका का किरदार निभा रही हैं, ने बताया, “डीआइवाय क्राफ्टिंग मेरी सबसे पसंदीदा हॉबी है। मुझे अपने हाथों से चीज़ें बनाना बहुत अच्छा लगता है- चाहे वो घर की सजावट हो, छोटे एक्सेसरीज़ हों या त्योहारों की सजावट। बचपन से ही मुझे यह शौक है। मुझे याद है कि दिवाली पर मैं अपनी मां के साथ ग्रीटिंग कार्ड और पेपर लैटन्र्स बनाती थी। आज भी मैं अपनी दिवाली की सजावट के सामान खुद बनाती हूं, जिनमें दीये, तोरण और वॉल हैंगिंग्स तक शामिल हैं। साधारण चीज़ों और अपनी कल्पना से कुछ खूबसूरत कृतियों में तब्दील होते देखना बहुत सुकून और खुशी देता है। क्राफ्टिंग करते समय मन शांत हो जाता है और शूटिंग की तेज़ ज़िंदगी से थोड़ी राहत मिलती है। यह मेरे लिए ध्यान जैसा है।”
गीतांजलि मिश्रा, जिन्हें दर्शक ‘हप्पू की उलटन पलटन‘ में राजेश के रूप में पसंद करते हैं, ने कहा, “मेरी ज़िंदगी में एक चीज़ जो हमेशा साथ रही है, वो है गाना। संगीत मुझे अंदर से जोड़ता है। चाहे दिन कितना भी थकाने वाला क्यों न हो, गाना गाते ही मन हल्का हो जाता है। शूट के बीच में मैं पुराने गाने गुनगुनाती रहती हूं और मेरे को-एक्टर्स मज़ाक में कहते हैं कि सेट मेरा छोटा सा म्यूज़िक स्टूडियो बन गया है। मैंने पहले शास्त्रीय संगीत सीखा है और जल्द ही फिर से इसे गंभीरता से सीखना चाहती हूं। गाना मेरे लिए सिर्फ शौक नहीं, बल्कि दिल की बात कहने का तरीका है।” शिल्पा शिंदे, जो ‘भाबीजी घर पर हैं 2.0‘ में अंगूरी भाबी के किरदार में नज़र आती हैं, कहती हैं, “अभिनय के अलावा मेरी सबसे बड़ी हॉबी खेती है। करजत में मेरा छोटा सा फार्म है, जहां जाना मुझे बहुत सुकून देता है। मिट्टी में बीज बोना, पौधों की देखभाल करना और उन्हें बढ़ते देखना बहुत अच्छा लगता है। मैं वहां सब्ज़ियां, फल और कुछ औषधीय पौधे भी उगाती हूं। मुंबई की भागदौड़ से जब भी मौका मिलता है, मैं अपने फार्म चली जाती हूं। वहां समय बिताकर मन और शरीर दोनों तरोताज़ा हो जाते हैं। यह मुझे ज़मीन से जुड़े रहना सिखाता है, और वही संतुलन मेरे काम में भी दिखता है।”