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अभिनेता-फिल्म निर्माता सचिन पिलगांवकर ने पूरे किए 63 साल

अनुभवी अभिनेता-फिल्मनिर्माता सचिन पिलगांवकर ने बुकमायशो के रेड लॉरी फिल्म फेस्टिवल (मुंबई) में अपने 63 साल के सिनेमाई सफर को साझा किया, बचपन के सेट-किस्से और दिग्गजों से मिले सबक बताए।

भारतीय सिनेमा के इतिहास पर उन्होंने कहा, “पहली भारतीय फिल्म—जो मूक थी—असल में मराठी फिल्म थी, क्योंकि उसे मराठी लोगों ने बनाया।”

पिलगांवकर सिर्फ साढ़े चार साल की उम्र में कैमरे के सामने आए: “उससे पहले की कोई याद नहीं; मेरी यादें तभी से शुरू होती हैं जब मैं इस इंडस्ट्री में दाखिल हुआ।” बचपन का खेल-सामान भी फिल्मी था—“मेरे खिलौने थे कैमरा, ट्राइपॉड, ट्रॉली, लाइट्स और किताबें। यही मेरा बचपन, यही मेरी परवरिश। अगर यह इंडस्ट्री न होती तो मैं क्या करता, मुझे कुछ और आता ही नहीं।”

उन्होंने जिज्ञासा और ऑब्ज़र्वेशन को अपनी ताक़त बताया—“शायद मैं बहुत ऑब्ज़र्वेंट हूँ। मेरी नज़र से रास्ते का गँडेरी वाला भी नहीं छूटता… आँख-कान खुले रखना हमेशा काम आया।”

सिनेमा के ब्लैक-ऐंड-व्हाइट दौर से स्ट्रीमिंग तक बदलाव पर पिलगांवकर ने कहा कि बुनियाद वही है—“कंटेंट ही एक चीज़ है जो इंडस्ट्री को बचाए रखेगी।”

गलतियों से सीखने पर: “ये सारे साल ब्रिलियन्स और बकवास दोनों से भरे हैं। कोई हमेशा ब्रिलियंट नहीं होता; गलतियों से भी सीखना होता है।”

लंबी उपस्थिति का मंत्र—जूनियर्स से सीखना। “पहले मैं सीनियर्स से सीखता था, अब जूनियर्स से सीखता हूँ, और शर्म नहीं लगती। रिलेवेंट रहना है तो आज की लैंग्वेज सीखनी पड़ेगी।”

फिल्मनिर्माता बनने की प्रेरणा गुरु दत्त की ‘काग़ज़ के फूल’ से मिली, जो उन्होंने सात साल की उम्र में दिन में तीन बार देखी: “पापा ने पूछा क्यों पसंद आई, तो मैंने कहा—डायरेक्टर की वजह से, और मैं डायरेक्टर बनना चाहता हूँ।”

क्राफ्ट उन्होंने हृषिकेश मुखर्जी और मीना कुमारी से सीखा। मुखर्जी ने कहा, “डायरेक्टर बनना है तो पहले एडिटर बनो—ऑटोमैटिकली डायरेक्टर बन जाओगे।” मीना कुमारी—“मीना अप्पा”—ने उनका उर्दू निखारा: “लिखना-पढ़ना न आए तो भी बोलना ऐसा हो कि रास्ते चलता आदमी मुड़कर देखे कि कौन बोल रहा है।” पिलगांवकर कहते हैं, “उर्दू मेरे सिस्टम, मेरे शरीर में है। माँ-भाषा मराठी है—मराठी मेरी माँ है, उर्दू मेरी मासी।” बाद में मजरूह सुल्तानपुरी ने भी उर्दू-रिश्ते को सींचा।

इतने लंबे करियर के बाद भी वह खुद को नए की तरह महसूस करते हैं: “जब भी कुछ शुरू करता हूँ, लगता है अभी इंडस्ट्री में आया हूँ।”

यह सत्र दर्शकों को पिलगांवकर की अनुभव-संपदा, प्रभावों और उस सोच की दुर्लभ झलक दे गया जिसने पीढ़ियों के भारतीय सिनेमा में उनका सफर आकार दिया।

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