देव पुत्र सुनील आनंद के निधन के अवसर पर देव आनंद कि फिल्मोंका लेखा जोखा और याद
लेख का शीर्षक देव आनंद के चाहने वालों को झटका देने वाला, नाराज करने वाला लगेगा, लेकिन ये एक सच्चाई है। क्योंकि देव आनंद ने लगातार पंद्रह फ्लॉप फिल्में दीं।

देव आनंद! दिलीप-राज-देव की तिकड़ी में से! देव आनंद को सदाबहार कहा जाता है। अपने भाई विजय आनंद के निर्देशन में गाइड, जॉनी मेरा नाम, ज्वेल थीफ जैसी हिट फिल्में देने वाले, हिरा पन्ना में बिकिनी पहनी ज़ीनत को “पन्ना की तमन्ना है” किशोर कुमार की आवाज़ में गाने वाले देव आनंद की आखिरी पंद्रह फिल्में लगातार फ्लॉप रहीं। और इन सभी फ्लॉप फिल्मों की शुरुआत हुई 1982 में आई स्वामी दादा से! लगातार पंद्रह फिल्में फ्लॉप देने वाले निर्माता-निर्देशक-अभिनेता!
1982 में आई स्वामी दादा से लेकर 2011 में चार्जशीट तक, 29 सालों में नवकेतन फिल्म्स के बैनर तले उन्होंने 15 फिल्में बनाईं। सभी फ्लॉप रहीं। इन्हीं में से एक अपने बेटे को लॉन्च करने वाली आनंद और आनंद थी। तो अव्वल नंबर फिल्म में तो खुद आमिर खान, एकता ने भी काम किया है। इसी एकता ने आगे चलकर मोहनीश बहल से शादी की।
1946 में प्रभात फिल्म्स की हिंदू-मुस्लिम एकता पर आधारित हम एक हैं फिल्म से डेब्यू करने वाले देव आनंद के आखिरी गिरते दौर की शुरुआत देस परदेस से ही हो गई थी। उसके बाद लुटमार, मनपसंद । असल में इन तीनों फिल्मों ने कोई खास बिजनेस नहीं किया। हीरोइन थीं टीना मुनीम! लेकिन कम से कम इन फिल्मों के गाने तो हिट हुए। मनपसंद फिल्म में मोहम्मद रफी की आवाज़ में “लोगों का दिल अगर उतना तुमको है तो बस मीठा मीठा बोलो”, यही उनका आखिरी हिट गाना साबित हुआ। कभी मोहम्मद रफी की आवाज़ में “बरबादियों का जश्न मनाता चला गया” या किशोर की आवाज़ में “किसका रास्ता देखे” गाने वाले देव आनंद की इन पंद्रह फिल्मों में से एक भी गाना हिट नहीं हो सका।
मनपसंद जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के प्रसिद्ध नाटक Pygmalion पर आधारित था। इसी थीम पर पु.ल. देशपांडे के ती फुलराणी नाटक ने मराठी नाटक में लोकप्रियता का नया शिखर छुआ था। दुनिया की कई भाषाओं में Pygmalion का अनुवाद सफल रहा है। लेकिन मनपसंदन हीं चली। देव आनंद ने असफलता का ठीकरा निर्देशक बसु चटर्जी पर फोड़ दिया। साथ में गिरीश कर्नाड होते हुए भी! क्योंकि लोगों को अब अपना चेहरा पसंद नहीं आ रहा है, इस सच्चाई को स्वीकारना उन्हें मुश्किल लगा होगा।
स्वामी दादा से lचार्जशीट तक ये फिल्में कब आईं कब गईं पता ही नहीं चला। गानों के हिट होने का सवाल ही नहीं था। भले ही राहुल देव बर्मन का संगीत हो और सुनील आनंद के लिए अभिजीत भट्टाचार्य जैसे नए गायक को मौका दिया हो! देव आनंद को छोड़कर राखी, स्मिता पाटील, राज बब्बर, रेखा, जैकी श्रॉफ जैसे दिग्गजों ने भी कई फिल्मों में काम किया। लेकिन फिल्में कब आईं कब गईं पता ही नहीं चला।
देव आनंद को बेहतरीन निर्देशक नहीं कहा जा सकता। भले ही हरे रामा हरे कृष्णा जैसी उनकी निर्देशित फिल्म तूफान की तरह चली। उस फिल्म के गाने, आर.डी. बर्मन का संगीत आज पाँच दशकों बाद भी लोकप्रिय है। लेकिन देव निर्देशक नहीं हैं। वो खुद के ही प्यार में मशगूल रहने वाले अभिनेता थे। उन्हें संभालने के लिए निर्देशक के रूप में उनके भाई विजय आनंद चाहिए थे। गाइड इसी जोड़ी ने दी। लेकिन विजय आनंद को अभिनय का चस्का लग गया। 1994 में आई सीरियल तहकीकात में सैम डिसिल्वा की भूमिका विजय आनंद ने की थी। सीरियल काफी हिट हुई थी। जो अच्छा निर्देशक था उसे अभिनय का शौक लग गया था और जिसकी सदाबहार छवि लोगों को पर्दे पर देखना पसंद था उस देव आनंद को निर्देशक बनने के सपने आ रहे थे।
दोनों भाई छुपा रुस्तम फिल्म में साथ थे। विजय आनंद उस फिल्म में भूमिका भी कर रहा था। लेकिन कव्वाली में विजय आनंद को मिलने वाला महत्व बड़े भाई को पसंद नहीं आया। उसने शूटिंग में अड़चनें डालनी शुरू कर दीं। आखिर में विजय ने अपना रोल कम कर दिया और छुपा रुस्तम बन पाई। देव आनंद ने ऐसा ही परेशान अपने बड़े भाई चेतन आनंद को भी किया था।
असल में अपनी सत्ता अब खत्म हो गई है, ये सच्चाई समझकर देस परदेस, लुटमार, मनपसंद के बाद देव आनंद को रुक जाना चाहिए था। मेरा नाम जोकर की असफलता के बाद राज कपूर को ये सच समझ आया और उन्होंने सीधे बिकिनी वाली डिम्पल का सहारा लेकर बॉबी को हिट कर दिखाया। उसके बाद भी राज कपूर अभिनय से दूर ही रहे।
कुछ ऐसा ही सच मनोज कुमार ने भी स्वीकारा। क्लर्क फिल्म फ्लॉप होने के बाद मैदान-ए-जंग और जय हिंद जैसी नब्बे के दशक की फिल्मों में उन्होंने आखिरी बार अभिनय और निर्देशन किया। लेकिन चिर-तरुण देव आनंद को ये कौन समझाए?
1982 से 2011 में उनके निधन तक देव आनंद की पंद्रह फ्लॉप फिल्मों के नाम :
स्वामी दादा, आनंद और आनंद, हम नौजवान, सच्चे का बोलबाला, लश्कर, अव्वल नंबर, सौ करोड़, प्यार का तराना, गुंड, रिटर्न ऑफ ज्वेल थीफ, मैं सोलह बरस की, सेंसर, लव एट टाइम्स स्क्वायर, मिस्टर प्राइम मिनिस्टर और चार्जशीट। इनमें से एक भी फिल्म याद है? संभव ही नहीं।
हां, कपिल शर्मा शो में कपिल देव द्वारा की गई देव आनंद की नकल सबको याद है। तब पचहत्तर साल के देव अटल बिहारी वाजपेयी जैसे धीमी गति से चलने वाले प्रधानमंत्री के सामने कैसे उछल-कूद कर चलते थे, उसकी बढ़िया नकल कपिल देव ने की थी।
रुकना देव आनंद के खून में ही नहीं था। घर पर रुककर बात किससे करें? उन्हें अपनी पत्नी के साथ कभी एक साथ नहीं देखा गया। इतना कि Rendezvous with Simi Garewal शो में देव अकेले आए थे और बगल की कुर्सी पर पत्नी कल्पना कार्तिक की शादी की फोटो रख दी थी। और देव सिमी के सवालों के जवाब दे रहे थे। इसी दौरान उन्होंने ‘Romancing with Life’ आत्मकथा भी लिखी थी।
क्रिकेट में कहा जाता है कि खिलाड़ियों को गिरता दौर शुरू होने से पहले संन्यास लेना चाहिए, लेकिन ये कई लोगों से नहीं हो पाता। फिल्म इंडस्ट्री का भी यही हाल है। दिलीप कुमार, राज कपूर, मनोज कुमार रुक गए। लेकिन चिर-तरुण देव आनंद इसे मानने को तैयार ही नहीं थे। क्योंकि उनके दिमाग में था उनका चढ़ता हुआ दौर! उसी के नशे में उन्होंने 29 सालों में 15 फिल्में बनाईं। आईं और चली गईं!
आज देव आनंद का जिक्र होता है उनके चढ़ते दौर की फिल्मों के लिए! और साथ ही एक कोशिश ये भी! उनके गिरते दौर को दिखाने की! फिलहाल इतना ही।
यह लेख संवाद 2025 के दिवाली अंक में प्रकाशित हुआ है। लेखक हैं जयंत माईणकर ।