रिव्यूज़

अस्सी तोह पूरे एक सौ है

फिल्म रिव्यू : अस्सी

  • हर्षदा वेदपाठक

ऐसेसी बलात्कार के आरोपियों के लिए मृत्युदंड की आवश्यकता को उजागर किया जाता है! अस्सी एक अटल अनापेक्षित है जो कि रेप आर्टिस्ट पर नेशनल को मिलाता है, जबकि कोर्ट कॉलेज को सील करने में असफल रहता है, फिल्म एक साहसिक संदेश देती है। कुल मिलाकर यह है कि अस्सी नाम के लगभग 80 मामले सामने आए हैं, जो हर दिन दर्ज किए जाते हैं, जो फिल्म के दौरान हर 20 मिनट में बढ़ते रहते हैं, जो कठोर वास्तविकता सामने आती है!

टी-सीरीज़ द्वारा बेनारस मीडिया वर्क्स के सहयोग से निर्मित, अनुभव सिन्हा की अस्सी एक बार फिर से वास्तविक जीवन की ‘निर्भया’ गैंग रेप और अन्य कई घटनाओं की याद दिलाती है, जो महिलाओं की सुरक्षा और बढ़ते बलात्कार हमलों के मुद्दों को दर्शाती है, चाहे पीड़ित की उम्र, पेशा, स्थान, जाति कुछ भी हो।

फिल्म एक स्कूल शिक्षक परिमा (कानी कुशरूति) के साथ शुरू होती है, जो एक मलयाली महिला है । उसपर कुछ युवाओं द्वारा गैंग रेप किया जाता है, जिनमें से एक का पिता एक अमीर प्रभावशाली व्यक्ति है। परिमा बुरी तरह से घायल, आंशिक रूप से कपड़े उतारकर रेलवे ट्रैक के बीच में मरने के लिए फेंक दिया जाता है । फ्लैशबैक हमें उसके सरल जीवन में ले जाता है, जहां वह अपने उत्तर भारतीय पति विनय (जीशान अय्यूब) और उनके बेटे ध्रुव (अद्विक जैस्वाल) के साथ रहती है।

परिमा को न्याय दिलाने के लिए विनय के मित्र कुमुद मिश्रा, वकील बनी तापसी किस तरह से मदत करते है यह देखा का सकता है ।

फिल्म में कानी कुशरूति ने एक आहत बलात्कार पीड़ित के रूप में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। आप वास्तव में उसका दर्द महसूस करते हैं, जब उसे चेहरे पर मारा जाता है और उसका खून बहता है, वह रोती है, जबकि बलात्कारि अपने घिनौनेपन की गिनती करते है और खेलते रहते हैं। यह विस्तृत दृश्य देखना बेहद असहज है, जो देखकर दर्शक सहम जाएंगे । वही पर कोर्ट में गुहार लगाती स्त्री, अपना शिक्षक जॉब पुनः पाने के लिए, जीवन को फिर से शुरू करने की जिद्द थानी हुई मां दिल में घर कर जाती है ।

न्याय के लिए अदालत में लड़नेवाली वकील रावी की भूमिका में तापसी पन्नू जम जाती है । बलात्कारित महिला को न्याय देना वह भी प्रचलित व्यवस्थित भ्रष्टाचार को, साथ में दिखाती तापसी रावी की भूमिका को अलग ऊंचाई पर लेके जाती है। जहां डीएनए नमूने और सबूतों को नष्ट कर दिया जाता है, ताकि जांच को तोड़ा जा सके। जबकि समाज एक बलात्कार पीड़ित को नीचा दिखाता है। इस पीड़ा को तापसी सहजता से निभाती है और दर्शकों को भी सोचनेपर मजबूर करती है।

अस्सी यह फिल्म वास्तव में हमारे मूल्य प्रणाली पर सवाल उठाती है, और हम अगली पीढ़ी को किस तरह की शिक्षा दे रहे हैं, जिसमें महिलाओं की अखंडता और समाज में सम्मान के प्रति सहानुभूति और गंभीरता की कमी है, जबकि यह फिल्म यह सवाल भी उठाती है कि हम महिलाओं के खिलाफ अपराध को रोकने के लिए कानून और व्यवस्था को बहाल करने के मामले में कहां जा रहे हैं?

फिल्म बलात्कारियों के लिए मृत्युदंड की एक मजबूत आवाज उठाती है, जो अपराधियों को तुरंत मारने का एक तरीका है। रावी एक वकील के रूप में ऐसे हत्याओं को सही नहीं ठहराती है और सार्वजनिक रूप से बोलती है, लेकिन उसका चेहरा ‘छत्री मैन’ के एक अनियंत्रित समर्थक द्वारा काले स्याही से सजा दिया जाता है।

फिल्म अपने अंतिम क्षणों में सफल होती है, जिसमें गौरव सोलंकी द्वारा लिखित तर्क और तथ्यात्मक प्रस्तुतियाँ हैं, जो इस अदालत नाटक की जान हैं। तापसी पन्नू एक अनुभवी वकील के रूप में उत्कृष्ट प्रदर्शन करती हैं, जो अपने चरित्र की भावनाओं को बखूबी दिखाती हैं। रेवती ने एक न्यायाधीश के रूप में अपनी भूमिका में शांति और गंभीरता देती है, जीशान अय्यूब ने पति विनय की भूमिका में समर्थन दिखाया है, और अद्विक जैस्वाल ने एक बच्चे के रूप में अपने माता-पिता को स्थिति का सामना करते हुए देखा है।

घर के किसी महिला पर अत्याचार हो तोह उस घर के आदमी की क्या स्थिति होती है, यह जीशान ने सटिक अंदाज में बताया है । समाज में बहुत सारी बातें, घटनाएं होती रहती है। पर बच्चों को उन बातों से घटनाओं से दूर रखा जाता है । जबकि ध्रुव,बलात्कारित मां का बेटा तरीके, समाज और घर इन दोनों के बीच चल रहे द्वंद से, उम्र के पहले ही कैसे बड़ा हो जाता है यह दिल को छू लेनेवाली अदाकारी से अद्विक जैस्वाल दर्शाता है ।

कुमुद मिश्रा अपनी परतदार प्रदर्शन से आपको आश्चर्यचकित कर देते है । साथ में नसरुद्दीन शाह, मनोज पाहवा, सुप्रिया पाठक, सीमा पाहवा और खास कर ज़ज की भूमिका में अभिनेत्री रेवती अपने अभिनय का उत्तम प्रदर्शन करते हैं ।

फिल्म करनी हो, तोह किसी भी फिल्म का रीमेक या फिर दो-चार फिल्मों की कहानी एकत्रित करके फिल्म बनाने का चलन बहुत जोर शोर से देखा जा रहा है । वहीं पर रेप, रेप सर्वाइवल और उनके इर्द-गिर्द घूरती कानूनी व्यवस्था ऐसे पेचीदा विषय को निर्देशक अनुभव सिन्हा ने चुनना अपने आप में काबिले तारीफ है । फिल्म का विषय नाजुक है, जिसके चलते फिल्म के दृश्य और संवाद कहीं भी ढीले नहीं होने देना यह बहुत जरूरी था । जिसका निर्देशक अनुभव सिन्हा ने पूरे पुर ध्यान रखा है। उसी के साथ में सटीक और दिन को छू लेने वाले संवाद । और इसी संवादों को पर्दे पर जीवित करनेवाले सटीक कलाकारों का चुनाव यह निर्देशक की दूरदृष्टता मानी जा सकती हैं । और जिसका फायदा उन्हें इस कहानी को दिल को छूनेवाली फिल्म में तब्दील होने पर मिलता है ।

अस्सी का बैकग्राउंड संगीत, कहानी की सहायता करता है। वही गाना कोई खास नहीं है ।

अस्सी यह फिल्म, हर एक उम्र के युवक युवती, स्त्री और पुरुष को देखनी चाहिए । पर जिसके लिए आपको 20 फरवरी 2026 तक का इंतजार करना होगा ।

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