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CBFC हुई 106 साल की

6 अगस्त 1920 को मुंबई में पहले स्थानीय #सेंसरबोर्ड की स्थापना हुई। इसी के साथ कलकत्ता, मद्रास और रंगून में भी स्थानीय सेंसर बोर्ड स्थापित किए गए।

पहला सेंसर प्रमाणपत्र गोउमुंट कंपनी को दिया गया।
अमेरिका में हॉलीवुड में चलचित्र की सेंसरशिप की पहली घटना 1897 में हुई जब जेम्स कॉर्बेट और रॉबर्ट फिट्ज़सिमन्स के बीच हेवीवेट वर्ग के मुकाबले को दिखाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। 1915 में अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने म्यूचुअल फिल्म कॉर्पोरेशन बनाम इंडस्ट्रियल कमीशन ऑफ ओहायो के मुकदमे में कहा कि सिनेमा एक शुद्ध व्यवसाय है, इसलिए उस पर सेंसरशिप का विरोध किया गया।

लेकिन 1915 से 1952 के बीच स्थानीय, राज्य और केंद्र सरकार के स्तर पर सेंसरशिप लागू करने के कई प्रयोग हुए। अमेरिकी सरकार द्वारा सेंसर बोर्ड न बनाया जाए, इसके लिए 1922 में रिपब्लिकन पार्टी के वकील और प्रभावशाली विल हेज़ के नेतृत्व में प्रोड्यूसर्स एंड डिस्ट्रिब्यूटर्स एसोसिएशन (PDA) नामक संगठन बनाया गया, जिसने सरकार के हस्तक्षेप से पहले ही खुद पर कुछ पाबंदियां लगा लीं।

1934 में जोसेफ ब्रीन के नेतृत्व में प्रोडक्शन कोड एडमिनिस्ट्रेशन (PCA) ने 1 जुलाई, 1934 से आगे आने वाली सभी फिल्मों के लिए प्रमाणपत्र लेना अनिवार्य कर दिया। ब्रीन ने इस कानून को बहुत कड़ा और परेशान करने वाला बना दिया। तथाकथित नैतिकता और धार्मिकता का पालन करना अक्षरशः अनिवार्य कर दिया गया।

बाद में 1952 में अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में PCA के अधिकार बहुत कम कर दिए। यह फैसला ‘मिरैकल’ नामक फिल्म से संबंधित मुकदमे से जुड़ा था, इसलिए इसे ‘मिरैकल डिसीजन’ (जादुई फैसला!) कहा जाता है। इसके बाद 1953 की फिल्म ‘द मून इज़ ब्ल्यू’ में Virgin, Seduce जैसे शब्दों का पहली बार इस्तेमाल किया गया।

दुनिया के अधिकांश देशों में फिल्मों की सेंसरशिप से जुड़े कानून और बोर्ड मौजूद हैं। भारत में पहली फिल्म 1913 में आई और सेंसर बोर्ड की स्थापना 1920 में हुई।

सिनेमैटोग्राफ एक्ट के तहत 1952 में सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेंसर की स्थापना हुई। कालांतर में इसमें कुछ नए बदलाव करके 1983 में इसका नाम बदलकर सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन कर दिया गया। पहले सिर्फ ‘U’ और ‘A’ ऐसे दो ही प्रमाणपत्र दिए जाते थे। बाद में ये ‘U’, ‘U/A’, ‘A’ और ‘S’ – अलग-अलग आयु वर्ग और दर्शक वर्ग के अनुसार दिए जाने लगे। लेकिन इसके साथ ही सेंसर बोर्ड कुछ सीन्स, शब्दों और वाक्यों पर चुपचाप कैंची भी चलाता है और प्रदर्शन पर प्रतिबंध भी लगाता है।

संजीव वेलणकर
पुणे

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